The Permanent Settlement (1793) & Agrarian Destabilization in Chotanagpur
Colonial Agrarian Policies, Subversion of Customary Khuntkatti Land Tenures, Auction Regulations, and the Panchet Raj Rebellion
1. The Ideological Clash: British Concept of Private Property vs. Indigenous Communal Ownership
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा वर्ष 1765 में Diwani Rights प्राप्त करने के पश्चात छोटानागपुर के जनजातीय पठार पर जिस नए प्रशासनिक तंत्र का पदार्पण हुआ, उसने केवल शासन प्रणाली को ही नहीं बदला, बल्कि यहाँ के सदियों पुराने सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्रियों और औपनिवेशिक प्रशासकों की वैचारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से पश्चिमी सामंतवाद और उभरते हुए Mercantile Capitalism पर आधारित थी। जॉन लॉक के संपत्ति सिद्धांतों से प्रभावित ब्रिटिश हुकूमत का यह दृढ़ विश्वास था कि Private Property (व्यक्तिगत निजी संपत्ति) एक प्राकृतिक और ईश्वरीय अधिकार है। कलकत्ता काउंसिल के प्रशासकों का स्पष्ट मत था कि यद्यपि यह धरा सभी मनुष्यों के उपभोग के लिए बनाई गई है, परंतु जब कोई व्यक्ति किसी भूमि पर अपना श्रम लगाता है, तो उस विशिष्ट भूमि खंड पर केवल और केवल उसी व्यक्ति का अनन्य और निजी अधिकार स्थापित हो जाता है। अतः भूमि को मापा जाना चाहिए, उसकी सीमाओं का पक्का सीमांकन होना चाहिए, और उसे एक ऐसी वस्तु में बदल देना चाहिए जिसे गिरवी रखा जा सके, खरीदा जा सके, बेचा जा सके और मालगुजारी न चुकाने पर सरकार द्वारा कानूनी रूप से नीलाम किया जा सके।
इसके सर्वथा विपरीत, छोटानागपुर के मुंडा, उरांव, हो, खड़िया और संथाल आदिवासियों का जीवन दर्शन इस पाश्चात्य भौतिकवादी अवधारणा के धुर विरोधी ध्रुव पर खड़ा था। आदिवासियों के चिंतन में प्रकृति ही सर्वोच्च नियम थी। भूमि, जंगल, नदियाँ और पहाड़ किसी एक व्यक्ति द्वारा बनाई गई वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि वे देवताओं और पूर्वजों द्वारा संपूर्ण कबीले को दी गई सामूहिक धरोहर थीं। भूमि का कभी कोई व्यक्तिगत मालिक हो ही नहीं सकता था। जिस कुल या खूंट ने अपने कठिन सामूहिक श्रम से जंगली झाड़ियों, पत्थरों और वृक्षों को काटकर खेती योग्य बनाया, वह भूमि उस पूरे कुल की साझी मिल्कियत बन गई। इसे ही ऐतिहासिक रूप से Mundari Khuntkatti System और उरांवों में Bhuinhari System कहा गया।
जनजातीय परंपरा में मानकी और मुंडा ग्राम प्रधान मात्र एक सामाजिक संरक्षक (Custodians) थे, न कि भूमि के मालिक। वे केवल आंतरिक विवादों को सुलझाने और बाहरी शासकों को सामूहिक रूप से स्वैच्छिक नजराना (Nazarana) सौंपने का माध्यम भर थे। जब कंपनी सरकार ने इस आदिम साम्यवाद और कबीलाई स्वायत्तता पर आधारित व्यवस्था में ब्रिटिश कानूनी संरचना को जबरन थोपते हुए भूमि को क्रय-विक्रय योग्य वाणिज्यिक पण्य (Commodity) बना दिया, तो छोटानागपुर के पठार पर एक ऐसा संरचनात्मक भू-राजनीतिक संकट उत्पन्न हुआ जिसने आने वाली दो शताब्दियों तक सशस्त्र जन-विद्रोहों और रक्तपात की अंतहीन श्रृंखला को जन्म दिया।
2. The Pre-1793 Revenue Landscape: From Todar Mal to the Quinquennial Settlement
कंपनी के आने से पूर्व, छोटानागपुर और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों में भू-राजस्व का कोई एकरूप और कठोर तंत्र मौजूद नहीं था। मुगल सम्राट अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल द्वारा वर्ष 1582 में लागू की गई Dahsala Bandobast व्यवस्था के अंतर्गत मालगुजारी की दर कृषि योग्य भूमि की औसत उपज का सामान्यतः एक-तिहाई भाग निर्धारित की जाती थी, जिसे प्रचलित बाजार भावों के आधार पर नकद या जिंस के रूप में आंका जाता था। तथापि, दूरदराज के जंगली और पठारी क्षेत्रों में यह व्यवस्था कभी भी पूर्ण रूप से क्रियान्वित नहीं हो सकी। 1685 से 1750 के मध्य मुगल साम्राज्य के विखंडन काल में बंगाल और बिहार के सीमांत क्षेत्रों में राजस्व वसूली का संपूर्ण दायित्व स्थानीय Amils (आमिलों) और राजस्व ठेकेदारों की मनमर्जी पर छोड़ दिया गया था।
1765 में दीवानी मिलते ही ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बंगाल और बिहार के आंतरिक जिलों के साथ-साथ इस दुर्गम सीमांत क्षेत्र से अधिकतम राजस्व किस प्रकार निचोड़ा जाए। वर्ष 1769 में कंपनी ने आमिलों की गतिविधियों पर निगरानी रखने और भूमि की वास्तविक उर्वरता, स्थानीय उपज तथा अवैध उपकरों की पड़ताल करने के लिए यूरोपीय प्रशासकों को Supervisors के पद पर नियुक्त किया। इन सुपरवाइजरों द्वारा एकत्र की गई अपूर्ण, सतही और भ्रामक रिपोर्टों के आधार पर वारेन हेस्टिंग्स ने वर्ष 1772 में कुख्यात पंचवर्षीय बंदोबस्त (Quinquennial Settlement / Panch-sala Bandobast) प्रारंभ किया।
इस व्यवस्था के तहत भूमि से राजस्व वसूलने का अधिकार खुली नीलामी में सर्वाधिक बोली लगाने वाले सटोरियों, महाजनों और बाहरी राजस्व ठेकेदारों को पांच वर्षों के लिए पट्टे पर बेच दिया गया। इन ठेकेदारों का न तो भूमि के संवर्धन से कोई सरोकार था और न ही रैयतों के कल्याण से। उन्होंने अधिकतम लाभ कमाने के उद्देश्य से किसानों से जबरन लगान और अवैध उपकर (Abwabs) वसूलना शुरू कर दिया। जब यह पांच साला बंदोबस्त विनाशकारी अकाल, कृषकों के पलायन और भारी राजस्व बकाए के कारण पूरी तरह विफल हो गया, तो कंपनी ने 1777 से वार्षिक बंदोबस्त (Annual Settlement) का अस्थिर प्रयोग किया। इस लगातार बदलती और अनिश्चित राजस्व व्यवस्था ने बंगाल प्रेसीडेंसी के ग्रामीण ढांचे को कंगाली के कगार पर ला खड़ा किया।
3. Enactment of the Permanent Settlement Regulation (1793): Lord Cornwallis’s Objectives
ब्रिटिश संसद और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के कड़े निर्देशों के पश्चात वर्ष 1786 में Lord Cornwallis को भारत का गवर्नर-जनरल बनाकर भेजा गया। उनका मुख्य दायित्व ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए एक स्थायी, सुरक्षित और पूर्व-अनुमानित राजस्व प्रवाह सुनिश्चित करना था। भारत आते ही कॉर्नवालिस ने बंगाल प्रेसीडेंसी के सबसे अनुभवी ब्रिटिश प्रशासकों को एक विस्तृत त्रि-सूत्रीय प्रश्नावली भेजी, जिसमें उनसे तीन मूलभूत प्रश्नों पर ठोस सुझाव मांगे गए थे:
1. प्रस्तावित मूल्यांकन: प्रत्येक जिले और परगने के लिए राजस्व का उचित और वैज्ञानिक मूल्यांकन क्या होना चाहिए?
2. बंदोबस्त का पक्षकार: यह दीर्घकालिक समझौता किसके नाम पर किया जाए—पारंपरिक जमींदारों के साथ या सीधे खेती करने वाले काश्तकारों (रैयतों) के साथ?
3. सुरक्षात्मक उपाय: रैयतों को जमींदारों के अत्याचारों से बचाने और जमींदारों द्वारा कंपनी को नियत समय पर बिना बाधा मालगुजारी जमा कराने के प्रभावी साधन क्या हो सकते हैं?
सर जॉन शोर और जेम्स ग्रांट के बीच चले लंबे बौद्धिक विवाद के बाद कॉर्नवालिस ने जमींदारों के पक्ष में निर्णय लिया। कॉर्नवालिस की योजना के पीछे दो स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक मान्यताएं कार्य कर रही थीं। प्रथम, ब्रिटिश सत्ता यह मानती थी कि जमींदार और तालुकदार अपनी सामाजिक और आर्थिक हैसियत के लिए दिल्ली के मुगल सम्राट या अपने जन्मजात कबीलाई अधिकारों पर निर्भर न रहकर कलकत्ता के नए ब्रिटिश दीवान की कृपा पर आश्रित रहेंगे। केवल वही व्यक्ति ‘मालिक’ कहलाने का हकदार होगा जिसे कंपनी का दीवान मान्यता प्रदान करेगा। द्वितीय, जिस प्रकार मुगलों के दौर में जमींदार मात्र एक राजस्व संग्रहकर्ता और बिचौलिया था, अंग्रेजों ने उस अवधारणा को पूरी तरह बदलकर उसे अंग्रेजी सामंतवाद की तर्ज पर पूर्ण भू-स्वामी (Landlord) बना दिया।
22 मार्च 1793 को बंगाल, बिहार और ओडिशा में Permanent Settlement Regulation of 1793 को स्थायी रूप से लागू कर दिया गया। सरकार की मालगुजारी की मांग को 1789-90 के राजस्व के आधार पर सदा-सदा के लिए स्थिर कर दिया गया। कंपनी ने कुल एकत्रित लगान का 10/11 भाग अपने खजाने के लिए निर्धारित किया और मात्र 1/11 भाग जमींदारों के पारिश्रमिक और प्रबंधन व्यय के लिए छोड़ा। कॉर्नवालिस का मानना था कि भूमि का स्थायी मालिकाना हक मिलने से जमींदार अपनी जागीरों में पूंजी निवेश करेंगे, जंगलों को काटकर कृषि का विस्तार करेंगे और इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक वफादार, संतुष्ट और शक्तिशाली सामाजिक आधार तैयार होगा।
4. Anatomy of the “Zamindar” vs. “Malik”: Legal Fiction and Subversion of Khuntkatti
स्थायी बंदोबस्त ने छोटानागपुर के जनजातीय परिदृश्य में भाषा और कानून का एक ऐसा मायाजाल रचा जिसने पूरे समाज को कानूनी रूप से पंगु बना दिया। पारंपरिक आदिवासी समाज में ‘जमींदार’ जैसा कोई शोषक संप्रत्यय विद्यमान नहीं था। किंतु औपनिवेशिक विधि-संहिताओं में ‘जमींदार’ शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के स्थान पर अत्यंत धूर्तता से Malik (स्वामी) शब्द का प्रयोग किया गया। ब्रिटिश कानून के अनुसार ‘मालिक’ का अर्थ था—भू-संपत्ति (Estate) या उसके किसी हिस्से का पूर्ण वैधानिक स्वामी। वहीं दूसरी ओर, ‘भू-संपत्ति’ को जिला उपायुक्त द्वारा तैयार किए जाने वाले लगान रजिस्टर में दर्ज उस भूमि के रूप में परिभाषित किया गया जिस पर लगान देय था अथवा जिसे सरकार द्वारा लगान-मुक्त घोषित किया गया था।
इस संकीर्ण कानूनी परिभाषा का सर्वाधिक घातक प्रभाव यह हुआ कि छोटानागपुर के वे लाखों अनाम देशज आदिवासी, जिन्होंने पीढ़ियों के कठोर परिश्रम से वनों को काटकर खेत बनाए थे, एक ही झटके में कानून के सुरक्षात्मक दायरे से बाहर फेंक दिए गए। अंग्रेजों ने अपनी सुविधानुसार नागवंशी राजाओं, रामगढ़ के राजा, जागीरदारों, इजारेदारों, मनसबदारों, घटवालों और यहाँ तक कि साधारण बाहरी साहूकारों को भी अपनी बहियों में ‘मालिक’ के रूप में दर्ज कर लिया।
सदियों पुरानी मुंडारी खूंटकट्टी (Mundari Khuntkatti) और भुईंहरी (Bhuinhari) व्यवस्थाएं, जो किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे कबीले की संयुक्त संपत्ति हुआ करती थीं, उन्हें ब्रिटिश अभिलेखों में जमींदारों की निजी जागीर का एक हिस्सा मान लिया गया। जिन मूलवासियों की सहमति के बिना उन्हें किसी ‘मालिक’ के अधीन रैयत घोषित किया गया, उनके पारंपरिक अधिकारों पर ताला लग गया। जमींदारों ने अपने निजी लाभ के लिए इन खूंटकट्टी जमीनों को छीनकर अपनी व्यक्तिगत खेती यानी Manjhihas, Zirat, Bakhasht और Nij-Jot में बदलना शुरू कर दिया। इस प्रकार एक झूठी वैधानिक परिकल्पना (Legal Fiction) के बल पर आदिवासियों को उनकी ही धरती पर अजनबी और बेदखल होने योग्य काश्तकार बना दिया गया।
5. The Illusory Protection: Patta, Qabuliyat, and Section 7 & 8 of the 1793 Regulation
स्थायी बंदोबस्त लागू करते समय लॉर्ड कॉर्नवालिस इस तथ्य से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं थे कि जमींदार वर्ग किसानों का अंधाधुंध शोषण कर सकता है। इसी दिखावटी सहानुभूति के तहत 1793 के स्थायी बंदोबस्त विनियम की धारा 7 में यह उपदेशात्मक वाक्य दर्ज किया गया कि जमींदारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने आश्रित तालुकदारों और रैयतों की देखभाल ‘सच्चे मन और नर्मी’ से करेंगे। वहीं धारा 8 में गवर्नर-जनरल को यह सर्वाधिकार सुरक्षित दिया गया कि वह समाज के सबसे लाचार और कमजोर वर्गों की सुरक्षा और कल्याण के लिए जब भी उचित समझे, आवश्यक नए कानून बना सकता है।
किसानों को जमींदारी मनमर्जी से बचाने के लिए इसी धारा 8 के अंतर्गत Patta (पट्टा – भूमि की जोत और देय लगान का लिखित अधिकार पत्र) और Qabuliyat (कबूलियत – किसान द्वारा उस लगान को चुकाने की लिखित स्वीकृति) की अनिवार्य व्यवस्था की गई। यह निर्देश दिया गया कि सभी प्रकार के अवैध उपकरों (Abwabs) को समाप्त करके उन्हें मूल लगान (Asal Rent) में जोड़ दिया जाए और भविष्य में किसी भी नए उपकर की वसूली को पूर्णतः गैर-कानूनी माना जाए। इसके अतिरिक्त, जमींदारों और रैयतों के खातों का पारदर्शी हिसाब रखने के लिए प्रत्येक गाँव में Patwari (पटवारी) रखना अनिवार्य किया गया।
परंतु व्यवहार के धरातल पर यह संपूर्ण सुरक्षात्मक ढांचा एक क्रूर मजाक साबित हुआ। छोटानागपुर के अधिकांश आदिवासी और किसान पूरी तरह निरक्षर थे; वे यह समझ ही नहीं पाए कि कागज का एक टुकड़ा उनकी पैतृक भूमि के अधिकार का निर्धारण कैसे कर सकता है। जमींदारों ने कभी कोई विधिवत पट्टा जारी ही नहीं किया, क्योंकि पट्टा देने से रैयतों के अधिकार कानूनी रूप से दर्ज हो जाते। वर्ष 1812 में तिरहुत के ब्रिटिश कलेक्टर ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि पूरे प्रांत में शायद ही कहीं किसी रैयत को पट्टा दिया गया हो या कबूलियत पर सही तरीके से आचरण हुआ हो।
उल्टे, कलेक्टरों ने इस विफलता का दोष सीधे किसानों पर मढ़ते हुए लिखा कि किसान स्वयं किसी एक निश्चित लगान में बंधना नहीं चाहते। व्यवहार में जमींदारों ने मनमाने अबवाब वसूलना जारी रखा—विवाह पर कर, उत्सव पर कर, जमींदार के हाथी खरीदने पर कर (Hathiana) और बेगारी (Beth-Begari)। कागजी कानूनों की आड़ में रैयत पूरी तरह असहाय और बंधुआ मजदूर बनकर रह गए।
6. Coercive Revenue Recovery: The Sunset Law, Regulation VII of 1799, and Regulation V of 1812
स्थायी बंदोबस्त केवल रैयतों के लिए ही विनाशकारी नहीं था, बल्कि इसने जमींदारों के सिर पर भी एक भयानक तलवार लटका दी थी, जिसे इतिहास में Sunset Law (सूर्यास्त कानून) के नाम से जाना जाता है। इस कानून के अनुसार, यदि कोई जमींदार निर्धारित तिथि के सूर्यास्त से पूर्व सरकारी खजाने में मालगुजारी की नियत किस्त जमा नहीं कर पाता था, तो उसकी संपूर्ण जमींदारी को तुरंत जब्त करके खुले बाजार में नीलाम (Public Auction) कर दिया जाता था। इस कठोर नियम के कारण बंगाल प्रेसीडेंसी के हजारों पारंपरिक जमींदार अपनी जागीरें खोने लगे।
जब जमींदारों ने ब्रिटिश सरकार के सम्मुख यह रोना रोया कि वे किसानों से समय पर लगान वसूल नहीं कर पा रहे हैं जिसके कारण उनकी जमींदारियां नीलाम हो रही हैं, तो बंगाल सरकार ने स्थायी बंदोबस्त को बचाने के नाम पर इतिहास का सबसे अत्याचारी और दमनकारी कानून पारित किया, जिसे Regulation VII of 1799 (हफ्तम कानून) कहा जाता है।
इस हफ्तम कानून ने जमींदारों को ऐसे असीम, निरंकुश और नृशंस अधिकार प्रदान किए जिनकी कल्पना मुगलों के समय में भी नहीं की जा सकती थी:
1. किसी भी रैयत द्वारा लगान में मामूली देरी होने पर जमींदार को बिना किसी अदालत या मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के सीधे किसान को शारीरिक रूप से बंदी बनाने और अपनी निजी हवालात में कैद करने का अधिकार मिल गया।
2. जमींदार अपने निजी लठैतों के बल पर किसान के घर में घुसकर उसके मवेशी, कृषि उपकरण, घरेलू सामान और खड़ी फसलों को तुरंत जब्त (Distraint / Kurki) करके नीलाम कर सकता था।
वर्ष 1880 के बंगाल राजस्व कानून आयोग (Revenue Law Commission) की रिपोर्ट में प्रख्यात प्रशासक बकलैंड (Buckland) ने स्वीकार किया कि 1799 का विनियमन VII केवल इसलिए गढ़ा गया था ताकि रैयतों की रीढ़ तोड़कर जमींदारों को कंपनी का लगान वसूलने में सक्षम बनाया जा सके। यद्यपि जन-असंतोष और क्रूरता के बढ़ते मामलों के दबाव में आगे चलकर ब्रिटिश सरकार ने Regulation V of 1812 (पंजम कानून) पारित करके जमींदारों के शारीरिक गिरफ्तारी के अधिकार को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया, परंतु फसलों की जब्ती और भूमि की नीलामी का अधिकार जस का तस बना रहा। भारत के पांच हजार वर्ष के ज्ञात कृषि इतिहास में 1793 से पूर्व किसानों की पैतृक भूमि की नीलामी की कोई संकल्पना ही नहीं थी; अंग्रेजों ने अपने सामंती कानूनों की अंधी नकल करके भारतीय किसानों को उनके ही खेतों से कानूनी रूप से बेदखल कर दिया।
7. Case Study in Resistance: The Panchet Raj Auction and the 1795–1798 Armed Uprising
स्थायी बंदोबस्त के सूर्यास्त कानून और नीलामी व्यवस्था के विनाशकारी परिणामों का सबसे सजीव और ऐतिहासिक उदाहरण छोटानागपुर के सीमावर्ती मानभूम क्षेत्र में स्थित प्राचीन Panchet Raj (पंचेत राज्य) की ऐतिहासिक बगावत है। 1793 के बंदोबस्त के मात्र दो वर्ष पश्चात, वर्ष 1795 में मालगुजारी के बकाए का आरोप लगाकर संपूर्ण पंचेत राज्य को कलकत्ता के राजस्व बोर्ड द्वारा नीलाम कर दिया गया। इस विशाल और गौरवशाली राज्य को कलकत्ता के एक धनाढ्य बंगाली ‘भद्रलोक’ व्यवसायी Nilambar Mitra (नीलांबर मित्रा) ने खरीद लिया।
पंचेत के पारंपरिक भूमिज राजा ने फोर्ट विलियम सरकार के समक्ष याचिका प्रस्तुत की कि लगान का बकाया जानबूझकर उनके भ्रष्ट दीवान और पुरुलिया स्थित मानभूम कलेक्टरेट के ब्रिटिश अमलों की मिलीभगत से उत्पन्न किया गया एक गहरा षड्यंत्र था ताकि राज्य को औने-पौने दामों में नीलाम किया जा सके। राजा ने इस फर्जी नीलामी को तुरंत रद्द करने की प्रार्थना की। परंतु कंपनी के घमंडी प्रशासकों ने इस गुहार को सिरे से खारिज कर दिया।
जब न्याय के सभी वैध रास्ते बंद हो गए, तो पंचेत के राजा ने अपनी संपूर्ण प्रजा का आह्वान किया। राजा के एक इशारे पर हजारों भूमिज लड़ाके, पाइक सरदार, सरदार घटवाल और स्थानीय किसान तीर-धनुष, तलवारें और भाले लेकर उठ खड़े हुए। पूरी रैयत ने नीलांबर मित्रा और उसके करिंदों का सामाजिक और भौतिक बहिष्कार कर दिया। जब मित्रा के गुर्गे और अंग्रेजी सिपाही राज्य में लगान वसूलने पहुँचे, तो उन पर हिंसक छापामार हमले किए गए। उन्हें राज्य की सीमा के भीतर एक कदम भी रखने नहीं दिया गया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मानभूम के ब्रिटिश कलेक्टर ने पंचेत राज्य को कई छोटे-छोटे प्रबंधकीय टुकड़ों में विभाजित करके नए इजारेदारों को बिठाने का प्रयास किया, परंतु विद्रोही आदिवासियों ने सरकारी चौकियों को जला दिया और प्रत्येक नए खरीदार को खदेड़ दिया। वर्ष 1795 से 1798 तक संपूर्ण पंचेत परगना खुली बगावत और युद्ध के मैदान में तब्दील रहा। कंपनी का खजाना खाली हो गया और सेना जंगलों में भटकती रही।
अंततः ब्रिटिश सरकार को यह कटु सत्य स्वीकार करना पड़ा कि जनजातीय भूमि संबंधों को कलकत्ता की अदालतों के कागजी नियमों से नहीं चलाया जा सकता। वर्ष 1798 में फोर्ट विलियम की सर्वोच्च सरकार ने औपचारिक रूप से समर्पण किया: नीलांबर मित्रा के पक्ष में हुई सार्वजनिक नीलामी को विधिवत रद्द घोषित किया गया और पंचेत के भूमिज राजा को उनका पुश्तैनी राज्य और गद्दी ससम्मान वापस लौटा दी गई। यह विद्रोह भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय था जहाँ संगठित जन-प्रतिरोध ने औपनिवेशिक नीलामी कानून को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।
8. Institutional Collapse: Ramgarh Military Collectorship and the Rural Agency Experiments
पंचेत जैसी बगावतों और छोटानागपुर के अशांत सीमांतों को नियंत्रित करने के लिए कंपनी ने एक विशाल और केंद्रीकृत प्रशासनिक ढांचे की स्थापना की जिसे Ramgarh Military Collectorship (रामगढ़ सैनिक कलेक्टरी) कहा जाता था। यह संपूर्ण प्रशासनिक इकाई एक संयुक्त अधिकारी—कलेक्टर-सह-जज-मजिस्ट्रेट (Collector-cum-Judge-Magistrate)—के तानाशाही नियंत्रण में थी। इस कलेक्टरी का भौगोलिक विस्तार विस्मयकारी रूप से विशाल था: यह उत्तर-पश्चिम में गया जिले के शेरघाटी से प्रारंभ होकर, पूर्व में मुंगेर के चकाई परगना और पंचेत के जमींदारी राज तक, और दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिण में पलामू और छोटानागपुर के विशाल नजराना महाल तक फैला हुआ था। इतने विशालकाय, बीहड़ और भिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों पर शेरघाटी या चतरा में बैठकर एक ही अधिकारी द्वारा न्याय और राजस्व की व्यवस्था संभालना प्रशासनिक दृष्टि से एक असंभव दिवास्वप्न था।
इसी व्यवस्था के समानांतर, हजारीबाग में एक अन्य ब्रिटिश प्रशासनिक एजेंसी कार्यरत थी जो गवर्नर-जनरल के राजनीतिक प्रतिनिधि (Political Agent to the Governor-General) के अधीन थी। यह एजेंसी दीवानी के दक्षिण-पश्चिम सीमावर्ती क्षेत्रों और संबलपुर के रजवाड़ा समूह का नियमन करती थी, जो 1826 में नागपुर के रघुजी भोंसले तृतीय के साथ हुई संधि के उपरांत औपचारिक रूप से ब्रिटिश प्रभुत्व में आए थे।
कंपनी ने ग्रामीण स्तर पर जमींदारों और रैयतों के बीच बढ़ते विवादों को दर्ज करने और आज के प्रखंड विकास कार्यालय (Block Development Office) जैसी एक स्वतंत्र ग्रामीण प्रशासनिक एजेंसी स्थापित करने का बहुचर्चित प्रयास किया। इसी उद्देश्य से Regulation II of 1815 पारित किया गया। इसके तहत पटवारियों के कामकाज की स्वतंत्र निगरानी करने और पट्टों तथा कबूलियतों की प्रामाणिकता की जांच करने के लिए प्रत्येक परगने में Qanungo (कानूनगो) का पद सृजित किया गया।
मात्र दो वर्ष पश्चात, स्थिति को और अधिक नियंत्रित करने हेतु Regulation XII of 1817 पारित किया गया जिसके माध्यम से पटवारियों को जमींदारों के चंगुल से निकालकर विधिवत सरकारी कर्मचारी घोषित किया गया। उनकी नियुक्ति और बर्खास्तगी का संपूर्ण अधिकार सीधे जिला कलेक्टर को सौंप दिया गया। परंतु ब्रिटिश नीति-निर्माताओं ने यहाँ एक भारी संरचनात्मक भूल की: उन्होंने कानून में यह विचित्र व्यवस्था रखी कि सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद पटवारियों को वेतन का भुगतान जमींदारों द्वारा ही किया जाएगा!
परिणाम वही हुआ जिसकी आशंका थी। जमींदार से वेतन पाने वाला पटवारी कभी भी निष्पक्ष सरकारी सेवक नहीं बन सका। वे जमींदारों के निजी चाटुकार, घरेलू नौकर और षड्यंत्रकारी मुंशी बनकर रह गए। कानूनगो का पद पूरी तरह निष्प्रभावी और मृतप्राय सिद्ध हुआ क्योंकि न तो जमींदारों ने और न ही रैयतों ने कभी अपने पट्टे कानूनगो के कार्यालय में सत्यापन हेतु प्रस्तुत किए। कानूनगो के पास पटवारियों को दंडित करने की कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी। अंततः अपनी घोर विफलता को स्वीकार करते हुए बंगाल सरकार ने वर्ष 1827 में कानूनगो का पद औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया। 1817 का पटवारी कानून पूरी तरह निष्फल हो गया और पूरा छोटानागपुर प्रशासनिक अराजकता के गर्त में गिर गया।
9. Towards Statutory Interventions: Regulation VII of 1822 and the Court of Directors (1824)
जब ग्रामीण स्तर पर मध्यवर्ती एजेंसियां बनाने के सारे प्रयास धूल-धूसरित हो गए, तो लंदन स्थित ईस्ट इंडिया कंपनी के Court of Directors की आंखें खुलीं। लगातार गिरते राजस्व, व्यापक किसान असंतोष और जमींदारों की बेलगाम लूट को देखकर कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने वर्ष 1824 में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी निर्देश जारी किया। उन्होंने बंगाल प्रेसीडेंसी के स्थायी बंदोबस्त वाले प्रत्येक जिले में भूमि का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने और सभी काश्तकारों के अधिकारों का एक प्रामाणिक अभिलेख (Record of Rights – RoR) तैयार करने का औपचारिक प्रस्ताव मंजूर किया।
तथापि, औपनिवेशिक नौकरशाही की सुस्ती, संसाधनों की कमी और जमींदारों के संगठित विरोध के कारण स्थायी बंदोबस्त वाले क्षेत्रों में इस वृहद कार्य को धरातल पर प्रारंभ करने में ही साठ वर्ष से अधिक का लंबा समय लग गया। दूसरी ओर, जो क्षेत्र स्थायी बंदोबस्त के दायरे से बाहर थे (अस्थायी बंदोबस्त वाले इलाके), उनके लिए वर्ष 1822 का Regulation VII पारित किया गया। इस कानून में यह क्रांतिकारी प्रावधान रखा गया कि आगामी सभी राजस्व बंदोबस्त तभी मान्य होंगे जब भूमि, उसके लगान और कृषि उत्पादन में हिस्सा रखने वाले सभी वर्गों, जोतदारों और व्यक्तियों के अधिकारों और देनदारियों का एक विस्तृत और स्थायी रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा।
वर्ष 1830 से 1850 के मध्य यह सघन सर्वेक्षण अभियान चलाया गया जिसके परिणामस्वरूप पहली बार जमींदारों और रैयतों के विभिन्न संवर्गों के वास्तविक अधिकारों का कानूनी स्वरूप स्पष्ट होना शुरू हुआ। इसके पश्चात ही ब्रिटिश संसद ने गवर्नर-जनरल इन काउंसिल को कानून बनाने के स्वतंत्र अधिकार दिए जिससे प्रसिद्ध तीन प्रांतीय कानूनी संहिताएं—बंगाल, मद्रास और बंबई कोड—विकसित हुईं।
इसी कानूनी विकास की अगली महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में Act XII of 1841 पारित हुआ। इस अधिनियम ने बकाया लगान के नाम पर काश्तकारों की भूमि की खुली नीलामी करने की बर्बर प्रथा पर पहली बार कानूनी रोक लगाई और नियत लगान पर खेती करने वाले पुश्तैनी किसानों यानी खुदकाश्त (Khudkasht) और कदिमी (Kadimi Ryots) रैयतों को काश्तकारी सुरक्षा प्रदान की। यही वैधानिक बीज आगे चलकर 1859 के ऐतिहासिक रेंट एक्ट (Act X) और अंततः 1908 के छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (Chota Nagpur Tenancy Act, 1908) का मुख्य आधार बने।
Analytical Comparison: Pre-Colonial Customary Tenures vs. Permanent Settlement System
| Structural Dimension | Pre-Colonial Indigenous Customary System | Permanent Settlement Framework (1793 Post-Colonial) |
|---|---|---|
| Concept of Land Ownership | सामूहिक कबीलाई स्वामित्व; खूंटकट्टी और भुईंहरी कुल की साझी प्राकृतिक संपत्ति। | व्यक्तिगत अनन्य स्वामित्व; जमींदार को कानूनन भूमि का एकमात्र मालिक घोषित किया गया। |
| Legal Status of the Ryot | भूमि का प्राथमिक निर्माता और स्थायी वंशानुगत संरक्षक; कोई बेदखल नहीं कर सकता था। | जमींदार के अधीन मात्र एक असुरक्षित किराएदार; पट्टा और कबूलियत की कागजी शर्तों पर निर्भर। |
| Nature of Revenue / Rent | अधिपति राजा को दिया जाने वाला स्वैच्छिक और नाममात्र का नजराना अथवा फसल का अंश। | सदा के लिए स्थिर किंतु अत्यधिक कठोर नकद मालगुजारी; 10/11 भाग कंपनी का अनिवार्य हिस्सा। |
| Default & Recovery Powers | प्राकृतिक आपदा या संकट में ग्राम सभा द्वारा सामूहिक समाधान; भूमि छीनने का कोई नियम नहीं। | हफ्तम कानून द्वारा गिरफ्तारी, मवेशियों व फसलों की जब्ती और सूर्यास्त कानून से जमीन की नीलामी। |
| Role of Intermediaries | मानकी, मुंडा और पड़हा राजा केवल कबीलाई व्यवस्था के संरक्षक और सामाजिक प्रतिनिधि थे। | बाहरी दिकू, महाजन, नीलामी खरीदार, आमिल, पटवारी और ठेकेदार शोषक बिचौलिए बने। |
| Dispute Resolution Mechanism | पारंपरिक पड़हा और ग्राम पंचायत द्वारा रूढ़िवादी मौखिक नियमों के आधार पर त्वरित न्याय। | शेरघाटी या कलकत्ता की दूरस्थ औपचारिक दीवानी अदालतें, जहाँ भ्रष्ट अमलों और वकीलों का बोलबाला था। |
Frequently Asked Questions (FAQs)
1. What was the core philosophical contradiction between British property laws and tribal land customs?
अंग्रेज Private Property को एक प्राकृतिक व्यक्तिगत अधिकार मानते थे जिसे बेचा या नीलाम किया जा सकता है, जबकि छोटानागपुर के जनजातीय दर्शन में भूमि प्रकृति प्रदत्त उपहार थी जिस पर पूरे कबीले का अविभाज्य और सामूहिक Khuntkatti Ownership होता था।
2. How did the legal term “Malik” subvert the customary rights of original tribal clearers?
औपनिवेशिक कानूनों में ‘जमींदार’ के स्थान पर Malik शब्द को उपायुक्त के लगान रजिस्टर में दर्ज संपत्ति के स्वामी के रूप में परिभाषित किया गया। इससे वनों को साफ करने वाले मूल आदिवासियों के रूढ़िवादी अधिकारों को नकारकर केवल लगान वसूलने वाले बाहरी बिचौलियों को वैधानिक स्वामी बना दिया गया।
3. Why did the Patta and Qabuliyat provisions of the 1793 Regulation fail completely in Chotanagpur?
आदिवासी काश्तकारों की व्यापक निरक्षरता, जमींदारों द्वारा लिखित अधिकार पत्र जारी न करने की हठधर्मिता और कंपनी प्रशासन की उदासीनता के कारण Patta और Qabuliyat व्यवस्था कागजों तक सीमित रही और जमींदारों ने मनमाने अवैध उपकर (Abwabs) वसूलना जारी रखा।
4. What made Regulation VII of 1799 (Haftam Law) uniquely oppressive for agrarian tenants?
इस हफ्तम कानून ने जमींदारों को यह निरंकुश शक्ति प्रदान की कि वे लगान बकाया होने पर बिना किसी अदालती आदेश या डिक्री के सीधे किसान को गिरफ्तार कर सकते थे और उसकी चल संपत्ति, मवेशियों तथा खड़ी फसलों को तुरंत जब्त (Distraint) करके नीलाम कर सकते थे।
5. Why did the British administration revoke the 1795 public auction of Panchet Raj?
कलकत्ता के नीलांबर मित्रा के पक्ष में हुई नीलामी के विरुद्ध पंचेत के भूमिज राजा और संपूर्ण रैयत ने 1795 से 1798 तक प्रचंड सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) छेड़ दिया था। नीलामी खरीदार को क्षेत्र में घुसने नहीं दिया गया जिससे विवश होकर फोर्ट विलियम सरकार को नीलामी रद्द करनी पड़ी।
20 High-Yield One-Liners (Quick Revision Digest)
- मुगल काल में 1582 से राजा टोडरमल की देखरेख में मालगुजारी की दर उपज का One-Third भाग निर्धारित थी।
- वर्ष 1769 में कंपनी ने आमिलों पर नियंत्रण रखने और कृषि आंकड़ों की पड़ताल हेतु Supervisors नियुक्त किए थे।
- बंगाल प्रेसीडेंसी में 1772 से 1777 तक वारेन हेस्टिंग्स का कुख्यात Quinquennial Settlement लागू रहा।
- लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1786 में भारत आकर स्थायी बंदोबस्त के मूल्यांकन हेतु तीन-सूत्रीय Questionnaire तैयार किया था।
- स्थायी बंदोबस्त विनियमन 22 March 1793 को बंगाल, बिहार और ओडिशा में विधिवत लागू हुआ।
- स्थायी बंदोबस्त के तहत कुल लगान का 10/11 भाग कंपनी को और 1/11 भाग Zamindar को प्राप्त होता था।
- 1793 के विनियम की धारा 8 के तहत रैयतों को शोषण से बचाने के लिए Patta and Qabuliyat का नियम बनाया गया था।
- औपनिवेशिक कानून में जमींदार को परिभाषित न कर भूमि के स्वामी हेतु Malik शब्द का उपयोग किया गया।
- नियत तिथि तक मालगुजारी न चुकाने पर जागीर नीलाम करने वाले नियम को Sunset Law कहा जाता था।
- कुख्यात Regulation VII of 1799 को लोकभाषा में ‘हफ्तम कानून’ कहा गया जिसने जमींदारों को गिरफ्तारी का अधिकार दिया।
- वर्ष 1812 के Regulation V (पंजम कानून) ने जमींदार द्वारा रैयत की गिरफ्तारी के अधिकार को समाप्त किया।
- वर्ष 1795 में बकाया लगान के नाम पर ऐतिहासिक Panchet Raj को सार्वजनिक रूप से नीलाम कर दिया गया था।
- पंचेत राज्य को कलकत्ता के नव-धनाढ्य भद्रलोक सदस्य Nilambar Mitra ने नीलामी में खरीदा था।
- सशस्त्र जन-प्रतिरोध और रैयतों के अडिग बहिष्कार के कारण कंपनी को वर्ष 1798 में Panchet Auction रद्द करनी पड़ी।
- रामगढ़ पहाड़ी क्षेत्र की सैनिक कलेक्टरी का प्रमुख एक संयुक्त Collector-cum-Judge-Magistrate होता था।
- वर्ष 1815 के Regulation II द्वारा पटवारियों की निगरानी हेतु प्रत्येक परगने में कानूनगो नियुक्त किए गए।
- वर्ष 1817 के Regulation XII द्वारा पटवारियों को सरकारी कर्मचारी बनाया गया किंतु उनका वेतन जमींदार ही देते रहे।
- प्रशासनिक रूप से पूरी तरह निष्प्रभावी और व्यर्थ साबित होने पर कंपनी ने वर्ष 1827 में Qanungo का पद समाप्त कर दिया।
- अस्थायी बंदोबस्त वाले क्षेत्रों में रैयतों के अधिकारों को दर्ज करने हेतु वर्ष 1822 का Regulation VII पारित किया गया था।
- वर्ष 1841 के Act XII ने लगान न चुकाने पर काश्तकारों की भूमि नीलाम करने की प्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगाया।
10 Examination-Grade Multiple Choice Questions (MCQs)
Q1. In which year did Lord Cornwallis arrive in India with instructions from the British Parliament to establish a permanent revenue system?
(a) 1772 (b) 1784 (c) 1786 (d) 1793
Answer: (c) 1786
विवरण: लॉर्ड कॉर्नवालिस वर्ष 1786 में गवर्नर-जनरल बनकर भारत आए थे और उन्होंने राजस्व दरों के स्थायी बंदोबस्त हेतु प्रशासकों को विस्तृत प्रश्नावली भेजी थी।
Q2. Which section of the Permanent Settlement Regulation of 1793 made the provision of Patta and Qabuliyat between landlords and ryots mandatory?
(a) Section 3 (b) Section 7 (c) Section 8 (d) Section 12
Answer: (c) Section 8
विवरण: 1793 के विनियम की आठवीं धारा के तहत जमींदार और रैयत के मध्य पट्टा और कबूलियत की लिखित व्यवस्था करना अनिवार्य किया गया था।
Q3. Which British colonial regulation was notoriously enacted in 1799 to rescue the Permanent Settlement by giving landlords arbitrary powers of arrest?
(a) Regulation VII of 1799 (b) Regulation V of 1812 (c) Regulation II of 1815 (d) Regulation XIII of 1833
Answer: (a) Regulation VII of 1799
विवरण: 1799 के विनियमन VII (हफ्तम) ने जमींदारों को बिना अदालती आदेश के रैयतों को शारीरिक रूप से गिरफ्तार करने और संपत्ति जब्त करने का अधिकार दिया था।
Q4. In the Report of the 1880 Revenue Law Commission, which British administrator commented extensively on the true motive of Regulation VII of 1799?
(a) Augustus Cleveland (b) Administrator Buckland (c) Thomas Wilkinson (d) John Shore
Answer: (b) Administrator Buckland
विवरण: बंगाल के प्रशासक बकलैंड ने 1880 के राजस्व आयोग में स्पष्ट लिखा था कि 1799 का कानून स्थायी बंदोबस्त को जमींदारों के माध्यम से बचाने के लिए बनाया गया था।
Q5. The Panchet Raj was auctioned off in 1795 due to revenue default and purchased by which member of the Calcutta Bhadralok?
(a) Dwarkanath Tagore (b) Nilambar Mitra (c) Radhakanta Deb (d) Rammohan Roy
Answer: (b) Nilambar Mitra
विवरण: बकाया लगान के एवज में 1795 में पंचेत राज को कलकत्ता के व्यवसायी नीलांबर मित्रा के हाथ नीलाम किया गया था।
Q6. Why did the Fort William Government annul the auction of Panchet Raj in 1798 and restore it to the original Bhumij Raja?
(a) The Calcutta High Court ruled it unconstitutional (b) The Raja paid double the arrears (c) Widespread armed tribal rebellion prevented the buyer from taking possession (d) Lord Wellesley intervened directly
Answer: (c) Widespread armed tribal rebellion prevented the buyer from taking possession
विवरण: पंचेत की प्रजा और भूमिज लड़ाकों के उग्र सशस्त्र विद्रोह के कारण खरीदार कभी इलाके में घुस ही नहीं सका जिससे विवश होकर सरकार को नीलामी रद्द करनी पड़ी।
Q7. The headquarters of the Military Collectorship of Ramgarh, which controlled Chotanagpur, was situated at which administrative center?
(a) Midnapore (b) Sherghati (c) Purulia (d) Ranchi
Answer: (b) Sherghati
विवरण: रामगढ़ पहाड़ी क्षेत्र की सैनिक कलेक्टरी का विस्तार गया के शेरघाटी से लेकर छोटानागपुर के नजराना महाल तक फैला हुआ था।
Q8. By which regulation did the British administration make Patwaris government servants appointed by the Collector in 1817?
(a) Regulation VII of 1799 (b) Regulation II of 1815 (c) Regulation XII of 1817 (d) Regulation VII of 1822
Answer: (c) Regulation XII of 1817
विवरण: 1817 के विनियमन XII द्वारा पटवारियों को सरकारी कर्मचारी घोषित कर उनकी नियुक्ति का अधिकार कलेक्टर को दिया गया, यद्यपि उनका वेतन जमींदार ही देते रहे।
Q9. In which year was the post of Qanungo completely abolished across Bengal Presidency after failing to supervise Patwaris and village records?
(a) 1815 (b) 1817 (c) 1824 (d) 1827
Answer: (d) 1827
विवरण: कानूनगो व्यवस्था के निष्प्रभावी और पट्टों के सत्यापन में पूरी तरह बेकार साबित होने के उपरांत वर्ष 1827 में यह पद समाप्त कर दिया गया।
Q10. Which enactment in 1841 prohibited the auctioning of agricultural land for rent arrears and recognized tenancy rights for Khudkasht ryots?
(a) Act X of 1859 (b) Act XII of 1841 (c) Regulation VII of 1822 (d) Act II of 1869
Answer: (b) Act XII of 1841
विवरण: 1841 के अधिनियम XII ने लगान न चुकाने पर जमीन नीलाम करने की व्यवस्था पर रोक लगाई तथा खुदकाश्त और कदिमी रैयतों को काश्तकारी सुरक्षा दी।
